Wednesday, August 5, 2026
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CGPSC 2025 का नोटिफिकेशन जारी, डिप्टी कलेक्टर के 14, DSP के 28 और नायब तहसीलदार के 51 समेत 238 पदों पर निकली भर्ती

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CGPSC 2025 Notification: छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा (CGPSC) 2025 के लिए नोटिफिकेशन जारी हो गया है. जिसमें डिप्टी कलेक्टर के 14, डीएसपी के 28, नायब तहसीलदार के 51 समेत 238 पदों के लिए भर्ती निकली है.

CGPSC 2025 Notification: छत्तीसगढ़ में CGPSC की तैयारी कर रहे युवाओं को लिए बड़ी खुशखबरी है. छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा (CGPSC) 2025 के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया. जिसमें डिप्टी कलेक्टर के 14, डीएसपी के 28, नायब तहसीलदार के 51 समेत 238 पदों के लिए भर्ती निकली है.

CGPSC 2025 का नोटिफिकेश जारी, 238 पदों पर निकली भर्ती

छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा द्वारा जारी नोटिफिकेशन में 17 विभागों में 238 पदों पर भर्ती निकाली है. जिसमें 14 डिप्टी कलेक्टर, 28 डीएसपी और सबसे ज्यादा नायब तहसीलदार के 51 पदों के लिए वैकेंसी निकाली गई है.

1 दिसंबर शुरू होगा आवेदन

वहीं राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 के लिए ऑनलाइन आवेदन 1 दिसंबर से को मध्यान्ह 12:00 बजे से 30 दिसंबर रात्रि 11:59 बजे तक उपलब्ध लिंक के माध्यम से किए जा सकेंगे.

वहीं ऑनलाइन आवेदन में त्रुटि सुधार का कार्य आवेदन करने की अंतिम तिथि के बाद 31 दिसंबर दोपहर 12:00 बजे से 2 जनवरी 2025 रात्रि 11:59 बजे तक किया जा सकेगा. उक्त त्रुटि सुधार का काम केवल एक बार ऑनलाइन ही किया जा सकेगा. वहीं त्रुटि सुधार निःशुल्क होगा. ऑनलाइन आवेदन में सशुल्क त्रुटि सुधार का कार्य निःशुल्क त्रुटि सुधार करने की अंतिम तिथि के बाद दिनांक 3 जनवरी 2026 को दोपहर 12:00 बजे से 5 जनवरी 2026 रात्रि 11:59 बजे तक किया जा सकेगा. उक्त सशुल्क त्रुटि सुधार हेतु रु. 500/- (रुपये पांच सी) शुल्क लिया जाएगा.

कब होगी परीक्षा?

छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा के जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक 22 फरवरी 2026 में प्रारंभिक परीक्षा होगी. इसके बाद मुख्य परीक्षा 16, 17, 18 और 19 मई को आयोजित की जाएगी.

खबर में अपडेट जारी है…

इंद्रप्रस्थ सोसाइटी के फेज 2 की लिफ्ट बेकाबू होकर नीचे गिरी, 2 युवतियां गंभीर

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Raipur: राजधानी रायपुर में एक बड़ा हादसा हो गया. यहां के इंद्रप्रस्थ सोसाइटी की लिफ्ट सातवीं मंजिल से बेकाबू होकर नीचे गिर गई. इस दौरान हादसे में दो महिला गंभीर रूप से घायल हो गई हैं, दोनों की हालत नाजुक बताई जा रही है.

Chhattisgarh

बेकाबू होकर नीचे गिरा लिफ्ट

Raipur: राजधानी रायपुर में एक बड़ा हादसा हो गया. यहां के इंद्रप्रस्थ सोसाइटी की लिफ्ट सातवीं मंजिल से बेकाबू होकर नीचे गिर गई. इस दौरान हादसे में दो महिला गंभीर रूप से घायल हो गई हैं, दोनों की हालत नाजुक बताई जा रही है.

सोमवार रात लगभग 11 बजे ग्राउंड फ्लोर में 2 महिलाए ऊपर जाने के लिए लिफ्ट का बटन दबाती है इस दौरान लिफ्ट निचे आते समय दाम अचानक बेक़ाबू हो गई और आठवीं मंज़िल पर जाकर लिफ़्ट रुक गई और उसमें ब्लास्ट हुआ. वहीं लिफ्ट का वेट मशीन नीचे आकर ग्राउंड फ्लोर में गिर गया. राहत की बात ये रही की महिलाओ के लिफ्ट के अंदर जाने से पहले हादसा हुआ और बाल बाल उनकी जान बची. वही घटना के बाद स्थानीय लोगों का कहना है लंबे समय से लिफ़्ट का मेंटेनेंस नहीं हुआ है

खबर में अपडेट जारी है…

लिफ्ट गिरने से दो महिलाएं घायल, 7 वीं मंजिल से गिरी

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लिफ्ट गिरने से दो महिलाएं घायल, 7 वीं मंजिल से गिरी


26-Nov-2025 9:13 AM

रायपुर, 26 नवंबर। आरडीए के इंद्रप्रस्थ-2 सोसायटी की लिफ्ट गिरने से दो महिलाएं घायल हो गई। यह लिफ्ट डी ब्लॉक में गिरी है। जो 7 वीं मंजिल से नीचे आ रही थी। पहले तीन मंजिल को सही आई और उसके बाद धड़ाम से नीचे गिर गई।



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किस्त रोककर 10 हजार रुपए वसूली का खेल,

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जांजगीर-चाम्पा। CG NEWS: जांजगीर-चाम्पा जिले में प्रधानमंत्री आवास योजना में भारी भ्रष्टाचार का एक और मामला सामने आया है। ग्राम पंचायत पेंड्री के वार्ड क्रमांक 6 के निवासी गेंदराम कश्यप ने रोजगार सहायक पर 10 हजार रुपये की अवैध मांग का गंभीर आरोप लगाया है।पीड़ित ग्रामीण गेंदराम ने कलेक्टर और जिला/जनपद पंचायत सीईओ को लिखित शिकायत देकर बताया कि सितंबर 2024 में पीएम आवास की पहली किस्त मिलने के बाद उन्होंने मकान निर्माण शुरू कर दिया था।

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लेकिन दूसरी किस्त जारी करने के नाम पर ग्राम पंचायत पेंड्री के रोजगार सहायक ललित कुमार कश्यप ने उनसे 10 हजार रुपये की मांग की।शिकायत के अनुसार, राशि नहीं देने पर रोजगार सहायक ने द्वेषभाव से दूसरी किस्त जनपद स्तर पर रोक दी, जिसके कारण ग्रामीण को अपना मकान पूरा करने जमीन तक बेचनी पड़ी।

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गेंदराम कश्यप ने यह भी आरोप लगाया कि गांव में कई हितग्राहियों से रुपए लेकर उनका आवास पूरा कराया जा रहा है, जबकि कुछ ऐसे लोग भी योजना का लाभ ले रहे हैं जिनके पहले से पक्के मकान मौजूद हैं और फर्जी जियो-टैग कर उन्हें पात्र दिखा दिया गया। इसके अलावा मजदूरी भुगतान में भी बड़े स्तर पर गड़बड़ी और राशि गबन का आरोप लगाया गया है।

ग्रामीण ने कलेक्टर, जिला पंचायत जांजगीर-चाम्पा और जनपद पंचायत नवागढ़ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से रोजगार सहायक के खिलाफ तुरंत जांच कर कठोर कार्रवाई करने और पीएम आवास की दूसरी एवं तीसरी किस्त जल्द जारी कराने की मांग की है।

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पांच प्रदर्शनकारी न्यायिक हिरासत में भेजे गए

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प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन: पांच प्रदर्शनकारी न्यायिक हिरासत में भेजे गए


25-Nov-2025 8:19 PM

दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने प्रदूषण विरोधी प्रदर्शन के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए पांच प्रदर्शनकारियों को दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है. एक प्रदर्शनकारी ने नाबालिग होने का दावा किया था, जिसके बाद उसकी उम्र की पुष्टि होने तक उसे एक सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया है. उसकी जमानत याचिका भी दाखिल की गई है. 

न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, रविवार को इंडिया गेट पर वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान, कथित तौर पर सड़क जाम करने, पुलिस के काम में बाधा पहुंचाने और पुलिसकर्मियों पर पेपर स्प्रे का इस्तेमाल करने के लिए 23 लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इस मामले में दो अलग-अलग पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज की गई है. 

पुलिस ने कोर्ट में यह भी कहा कि प्रदर्शनकारियों ने माओवादी नेता माडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए. हिडमा की हाल ही में आंध्र प्रदेश में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मौत हुई है. दिल्ली पुलिस ने कहा कि वह प्रदर्शनकारियों से पूछताछ कर यह पता लगाना चाहती है कि कहीं उनका माओवादी संगठन से कोई संबंध तो नहीं है या इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं है. 

वहीं, दो आरोपियों के वकील ने कोर्ट से कहा कि उनके मुवक्किलों को हिरासत के दौरान यातना दी गई, जिसके चलते उन्हें चोटें आयीं. वकील ने कहा कि वे शांतिपूर्वक ढंग से प्रदर्शन कर रहे थे और किसी भी देश-विरोधी या नक्सली गतिविधि में शामिल नहीं थे. एक अन्य वकील ने कोर्ट से कहा कि उनका मुवक्किल खुद एक वकील है और उसकी भी पुलिस ने पिटाई की. (dw.com/hi)



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यूरोपीय संघ के सदस्य देश समलैंगिक शादियों को मान्यता देंः कोर्ट

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यूरोपीय संघ के सदस्य देश समलैंगिक शादियों को मान्यता देंः कोर्ट


25-Nov-2025 8:20 PM

यूरोप की एक शीर्ष अदालत ने यूरोपीय संघ के सदस्यों से कहा है कि वे एक दूसरे के यहां दर्ज हुई समलैंगिक शादियों को मान्यता दें. इस बारे में जर्मनी में शादी करने वाले पोलिश जोड़े ने याचिका दायर की थी. 

इस जोड़े में एक सदस्य जर्मनी का नागरिक है. इन लोगों ने जर्मनी में ही रहने के दौरान 2018 में शादी कर ली थी. हालांकि, बाद में वे पोलैंड आ गए. यहां पर जब उन्होंने अपनी शादी का सर्टिफिकेट दर्ज कराने की कोशिश की तो उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली. अधिकारियों ने कहा “पोलैंड का कानून समान लिंग वाले लोगों के बीच शादी की अनुमति नहीं देता.”

यूरोपीय संघ की अदालत ने इस मामले में सुनवाई करने के बाद कहा है, “जिन लोगों की बात हो रही है वे यूरोपीय संघ के नागरिक हैं और सदस्य देशों के इलाके में मुक्त रूप से आने जाने और सामान्य पारिवारिक जीवन बिताने का अधिकार है, यह अधिकार तब भी है जब वे अपने मूल स्थान पर लौटने का फैसला करते हैं.”

अदालत ने कहा है कि उन्हें इसकी अनुमति नहीं देना यूरोपीय संघ के कानून का उल्लंघन है और “यह ना सिर्फ लोगों के आने जाने और रहने की आजादी बल्कि निजी और पारिवारिक जीवन के बुनियादी अधिकारों का भी उल्लंघन है.”  (dw.com/hi)



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पप्पियों में भी मौजूद होता है भेड़ियों का डीएनए

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पप्पियों में भी मौजूद होता है भेड़ियों का डीएनए


25-Nov-2025 8:21 PM

नन्हें मुन्ने प्यारे से पप्पी जो बच्चों के खासे दुलारे होते हैं, उनमें भी भेड़ियों का डीएनए मौजूद हो सकता है. अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खोज कर यह जानकारी दी है कि दो तिहाई कुत्तों की प्रजातियों में भेड़िये के डीएनए की इतनी मात्रा जरूर होती है जिसका पता लगाया जा सके. वैज्ञानिकों ने आधुनिक कुत्तों की 64 फीसदी प्रजातियों में भेड़िये का डीएनए होने की जानकारी जुटाई है.  

यह डीएनए की वह मात्रा नहीं है जो 20,000 साल पहले जब भेड़ियों से कुत्तों की प्रजाति विकसित हुई तब आई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा लग रहा है कि विकसित होने के बाद भी भेड़ियों और कुत्तों के बीच बीते कुछ हजार सालों में भी सहवास होता रहा है. नई रिसर्च रिपोर्ट के सहलेखक लोगान किस्टलर का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि भेड़िए जंगल से आकर, “आपके पालतू कुत्तों के साथ सहवास करते रहे हैं.” भेड़िए और कुत्ते के संसर्ग से बच्चे पैदा हो सकते हैं. हालांकि, इनके बीच संबंध बनने की घटनाएं दुर्लभ हैं. 

वैज्ञानिकों को यह जरूर लगता है कि कुत्तों के आकार, सूंघने की शक्ति और यहां तक कि आधुनिक कुत्तों के प्रजातियों की प्रवृत्तियों पर भी भेड़िए के डीएनए का असर होता है. इससे पहले की रिसर्च में यह बात सामने आती रही है कि कुत्ते के कुत्ता होने का मतलब है कि उसके अंदर भेड़िए का डीएनए नहीं बचा. (dw.com/hi)



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भारत के सुप्रीम कोर्ट में क्यों है ‘उच्च जातियों’ का वर्चस्व

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भारत के सुप्रीम कोर्ट में क्यों है ‘उच्च जातियों’ का वर्चस्व


25-Nov-2025 9:46 PM

मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई के रिटायर होने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में केवल एक दलित और एक महिला जज ही बचे हैं. उनके अलावा ज्यादातर जज उच्च हिंदू जातियों के पुरुष हैं. विविधता के लिए कितना तैयार है सुप्रीम कोर्ट?

 डॉयचे वैले पर महिमा कपूर सोनम मिश्रा का लिखा-

पिछले छह महीनों से भारत के सर्वोच्च न्यायालय की अगुवाई एक ऐसा व्यक्ति कर रहा था, जो भारत के सबसे ज्यादा भेदभाव झेलने वाले समुदायों में से एक से आते थे. 23 नवंबर को रिटायर हुए मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई की अगुवाई में देश ने एक दुर्लभ दृश्य देखा. जब देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक दलित विरासत वाला व्यक्ति बैठा. दलित समुदाय को हिंदू समाज की जाति व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर माना जाते है. यहां तक कि इस समुदाय को पहले “अछूत” भी कहा जाता था. आज भी देश के कई हिस्सों में उन्हें भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है.

गवई के पिता दलित समुदाय के एक प्रमुख नेता थे. उन्होंने गवई के जन्म से पहले बौद्ध धर्म अपना लिया था. जिस कारण गवई भी बौद्ध धर्म का पालन करते थे. लेकिन अपने करियर के दौरान उन्होंने अपनी दलित पहचान को भी स्वीकार किया और माना कि संविधान की आरक्षण जैसी नीतियों ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष तक पहुंचने में मदद की है. गवई, सुप्रीम कोर्ट के इतिहास के पहले बौद्ध और दूसरे दलित मुख्य न्यायाधीश रहे हैं.

गवई की इस उपलब्धि के बावजूद भारत के कई हिस्सों में आज भी महिलाएं और वंचित समुदाय अपने जीवन में आगे बढ़ने के दौरान ऐतिहासिक पिछड़ापन, पक्षपात और लैंगिक भेदभाव का सामना करते हैं. डीडब्ल्यू ने भारत की सर्वोच्च अदालत में विविधता की स्थिति को ध्यान से देखने की कोशिश की है. इस जांच में जजों के लिंग, धर्म और जाति जैसे पहलुओं का ध्यान रखा गया है.

आंकड़े क्या कहते हैं?

सुप्रीम कोर्ट अपने न्यायाधीशों की जाति से जुड़ा आधिकारिक डेटा सार्वजनिक नहीं करता है. जिस कारण हर जज की जाति और धार्मिक पहचान को निश्चित रूप से पता लगाना संभव नहीं है. लेकिन फिर भी हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि गवई के रिटायर होने के बाद बचे हुए 33 जजों में से कम से कम 12 जज ब्राह्मण हैं. जो कि हिंदू धर्म की सबसे ऊंची जातियों से आते हैं. 2020 के प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, ब्राह्मण जाति भारत की कुल आबादी का केवल चार फीसदी हिस्सा है. लेकिन देश के सर्वोच्च न्यायालय में उनकी हिस्सेदारी 36 फीसदी है.

इन 12 जजों के अलावा अदालत के बाकी आठ जज भी अन्य उच्च जातियों से ही आते हैं. जिससे सुप्रीम कोर्ट के कुल जजों का 60 फीसदी हिस्सा ऊंची जाति के हिंदू जजों से ही बन जाता है.

अब गवई के रिटायर होने के बाद अदालत में केवल एक दलित जज ही बचा है. यहां तक कि अनुसूचित जनजाति (यानी एसटी) समुदाय से तो एक भी जज नहीं है. एसटी वर्ग में उन आदिवासी समुदायों को शामिल किया जाता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर माना गया है और संविधान के तहत उन्हें विशेष सुरक्षा मिली है. हालांकि, दलितों के साथ मिलकर यह समुदाय भारत की कुल आबादी का 35 फीसदी हिस्सा है.

बचे हुए अन्य पांच जज पिछड़ा वर्ग (यानी ओबीसी) से आते हैं. संविधान में उन्हें सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा माना गया है. इनके अलावा डीडब्ल्यू अन्य तीन जजों की जाति की पुष्टि नहीं कर सका है. बाकी कम से कम चार जज धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं. जिसमें एक मुस्लिम, एक ईसाई, एक पारसी और एक जैन है. 33 जजों में से केवल एक जज, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना महिला हैं. हालांकि, देश की लगभग 48.5 फीसदी आबादी महिलाएं हैं. इसके बावजूद आज तक कभी किसी महिला ने मुख्य न्यायाधीश का पद नहीं संभाला है.

उम्मीदवारों में नाममात्र की विविधता

डीडब्ल्यू से बात करने वाले कई पूर्व सुप्रीम कोर्ट जजों ने शीर्ष अदालत में विविधता की कमी के लिए सीमित और कमजोर भर्ती प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराया है.

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मदन लोकुर (2012–2018) ने कहा, “अब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं और वंचित समुदायों के लोग सिस्टम में आ रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद अभी भी उनकी संख्या काफी कम है.” उन्होंने कहा, “ऐतिहासिक रूप से कानूनी व्यवस्था हमेशा से पुरुषों के कब्जे में ही रही है, और उसमें भी ज्यादातर वही लोग आगे बढ़े हैं, जो अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) से नहीं आते हैं. उन्होंने आगे कहा, “हालांकि, स्थिति बदल जरूर रही हैं. लेकिन असल सवाल यह है कि क्या बदलाव की यह रफ्तार पर्याप्त है?”

इसके अलावा कई जजों ने यह भी माना कि भारतीय न्यायपालिका में आज भी भाई–भतीजावाद व्यवस्था मौजूद है. हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी माना कि अब कई पहली पीढ़ी के वकील और जज भारी संख्या में सामने आ रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने में जजों को दशकों लग जाते हैं

बदलती व्यवस्था का एक संकेत यह भी है कि 2024 तक भारत की जिला अदालतों में 38 फीसदी जज महिलाएं हो गई थी. हालांकि, छह साल पहले तक यह संख्या केवल 28 फीसदी ही थी.

नवंबर 2024 में रिटायर हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था, “मैंने पिछले 15–20 सालों में एक बड़ा बदलाव होते देखा है, यह बेहद बड़ा है.” उन्होंने कहा, “हमें सुनिश्चित करना होगा कि जिस पूल से हम सुप्रीम कोर्ट में जज चुनते हैं, वह विविध हो.” चंद्रचूड़ हमेशा से पारदर्शिता, विविधता और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रबल समर्थक माने जाते रहे हैं. उन्होंने आगे कहा, “लोग सीढ़ी चढ़ रहे हैं.”

हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि करियर में आगे बढ़ने की प्रक्रिया “काफी धीमी” होती है. जिसका मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले जजों को आमतौर पर यहां तक पहुंचने के लिए 50 वर्ष का समय लग जाता है.

महिला वकीलों के लिए “काफी बेहतर हुई है स्थिति”

इसमें सबसे अधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि 2022 के एक सर्वे के मुताबिक भारत में केवल 15 फीसदी वकील ही महिलाएं हैं.

2025 की शुरुआत में रिटायर हुई दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व जज रेखा पल्ली ने कहा कि आज भी ज्यादातर मुवक्किल पुरुष वकीलों को ही तरजीह देते हैं. उन्होंने कहा, “मेरे समय में मेरे साथ केवल कुछ गिनी-चुनी ही महिलाएं (वकालत में) थी. अब हालातों में काफी सुधार हुआ है, लेकिन अब भी महिलाओं को काफी कम अवसर मिलते हैं.”

उन्होंने यह भी कहा कि अदालत में बहस करने वाली भूमिकाओं में पर्याप्त महिला वकील नहीं हैं. उन्होंने बताया, “जब मैं युवा लड़कियों से पूछती हूं कि वह अदालत में बहस क्यों नहीं कर रहीं, तो कई बार वह बताती हैं कि उन्हें पर्याप्त केस ही नहीं मिलते है.” जिस वजह से उन्हें अदालत में अपनी क्षमता दिखाने का मौका ही नहीं मिल पाता है.

युवा जजों की राह में काफी संघर्ष

उत्तरी भारत की एक युवा जज सीमा (इस लेख के लिए वह अपनी पहचान सीमा बताती है) कई घंटों की यात्रा करके अपने घर से निचली अदालत में मामलों की सुनवाई करने जाती हैं. अपने परिवार में ऐसा प्रतिष्ठित पद पाने वाली वह पहली महिला हैं. लेकिन अपने सपनों की नौकरी करते हुए उन्हें लगातार कई कठिन संघर्ष झेलने पड़ते हैं.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, “कुछ सालों बाद तो मैं यह नौकरी ही छोड़ना चाहती थी. जैसे-जैसे आप बड़े शहरों से छोटे शहरों की ओर जाते हैं, वैसे-वैसे हालात और व्यवहार खराब होने लगते हैं.” सीमा ने बताया कि उन्हें कई बार वरिष्ठ जजों को खाना परोसने, चाय या कॉफी लाने जैसे काम भी करने पड़ते थे. उन्होंने कहा, “एक बार तो एक वरिष्ठ वकील ने कोर्ट में खुलेआम कह दिया था कि ‘इसे क्या पता? यह नई है,’” जिसे वह साफ तौर पर अपने प्रति लैंगिक भेदभाव का मामला मानती हैं.

‘भारतीय न्यायपालिका भी भारतीय समाज का प्रतिबिंब’

डीडब्ल्यू से बात करते हुए कई पूर्व हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जजों ने न्यायपालिका में किसी भी तरह का भेदभाव मानने से साफ इनकार किया. जस्टिस पल्ली ने कहा, “यह कहना गलत होगा कि कोई भी व्यवस्था भेदभाव से लिप्त है. मैं यह बात बहुत स्पष्ट करना चाहता हूं कि अगर आप अच्छे हैं, तो आपको प्रमोशन जरूर मिलेगा.”

हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह नहीं नकारा कि कभी–कभार “उत्पीड़न के कुछ मामले” रहे हैं. उन्होंने कहा, “भारतीय न्यायपालिका भारतीय समाज का ही प्रतिबिंब है. इसलिए यह उम्मीद करना कि न्यायपालिका पूरी तरह सामाजिक पक्षपात से मुक्त होगी, शायद सही नहीं होगा.” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन हमारे पास एक मजबूत शिकायत-निवारण प्रणाली है, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.”

शिकायत यानी दोधारी तलवार

सीमा यह सुन कर हंस पड़ती हैं कि वह आधिकारिक शिकायत भी तो दर्ज की जा सकती हैं. उन्होंने कहा, “न्यायपालिका एक बहुत जुड़ा हुआ तंत्र है, जो संपर्कों से चलता है. अगर मैं शिकायत करूंगी, तो मुझ पर भी तुरंत शिकायत दायर हो जाएगी और मेरी सालाना रिपोर्ट खराब कर दी जाएगी.”

सालाना रिपोर्ट यानी जिसमें किसी न्यायिक अधिकारी के पूरे साल के काम और व्यवहार का मूल्यांकन किया जाता है. यह जजों के प्रमोशन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. सीमा और कई अन्य जिला-स्तर के जजों ने डीडब्ल्यू को बताया कि सिस्टम में “पुरानी दुश्मनी निकालने” के लिए सालाना रिपोर्ट का गलत इस्तेमाल करना भी आम बात है.

एक अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले सिविल जज ने बताया कि उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया गया था और बिना किसी जांच या सुनवाई के ही उन्हें तुरंत ट्रांसफर कर दिया गया था. उन्होंने कहा, “एक बार शिकायत लग गई, तो चाहे वह बाद में झूठी भी साबित हो जाए, लेकिन प्रमोशन को तो भूल ही जाइए. यह सब काफी आम बातें हैं.”

एक पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ने नाम न बताने की इच्छा जताते हुए कहा कि उन्होंने सुना है कि सालाना रिपोर्ट का दुरुपयोग होता है. लेकिन उन्होंने इसके साफ सबूत नहीं देखे हैं. उनके अनुसार, यह समस्या व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने से ज्यादा कुछ चुनिंदा लोगों को करियर में आगे बढ़ाने से जुड़ा होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने जाति-आधारित भेदभाव की निंदा की

हालांकि, कुछ चर्चित मामलों ने इस सोच के विपरीत तस्वीर पेश की है.

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के भीतर जाति-आधारित भेदभाव की कड़ी आलोचना की. यह मामला एक निचली अदालत के जज से जुड़ा था, जिन्हें उनकी सालाना रिपोर्ट में अचानक आई गिरावट और बढ़ोतरी के आधार पर जबरन रिटायरमेंट दे दिया गया था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उस जज की बर्खास्तगी रद्द कर दी थी. यहां तक कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा था, “उन्हें निशाना बनाया जा रहा है, वह भी सिर्फ इसलिए कि वह निचली जाति से आते हैं. हाई कोर्ट में यह एक बड़ी समस्या है.”

एक तरफ यह मामला भेदभाव का सबूत माना जा सकता है. वहीं दूसरी तरफ, पूर्व जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना था कि यह घटना दिखाती है कि शिकायत-निवारण प्रणाली काम करती है.

एक अच्छा सुप्रीम कोर्ट जज बनने के लिए क्या जरूरी है?

भारत की सर्वोच्च अदालत तक पहुंचने की चाहत रखने वाले जजों को सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम से सिफारिश प्राप्त करनी होती है, जिसमें पांच सबसे वरिष्ठ जज शामिल होते हैं. साथ ही, कोलेजियम की आंतरिक चर्चाएं और किसी नाम को चुनने या न चुनने के कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते हैं. और जिन उम्मीदवारों को अस्वीकार कर दिया जाता है, उनके पास अपील करने का भी कोई तरीका नहीं होता है.

जस्टिस लोकुर और जस्टिस चंद्रचूड़ भी कोलेजियम में रह चुके हैं. उन्होंने बताया कि चयन प्रक्रिया में जजों की वरिष्ठता, उनके निर्णयों की गुणवत्ता, उनकी सालाना रिपोर्ट और ईमानदारी जैसे मानदंड शामिल होते हैं. जिसके बाद विविधता के कारक भी आते हैं. जिसमें उनकी भौगोलिक पृष्ठभूमि, उनका व्यक्तिगत अनुभव, उनकी जाति और धर्म शामिल होते हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़ के अनुसार, उम्मीदवारों का अधिक विविध समूह तैयार करने के लिए स्कूलों और लॉ फर्मों के शुरुआती स्तर पर सुधार की जरूरत है. उन्होंने कहा, “सिस्टम के बाहर खड़े होकर आलोचना करना काफी आसान होता है, लेकिन असल बदलाव लाना एक अलग बात है.” साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि मौजूदा न्याय प्रणाली लिंग, जाति या धर्म के आधार पर प्रमोशन को नहीं रोकती है.

जस्टिस लोकुर ने कहा, “यदि किसी में योग्यता है, तो उसे जरूर प्रमोशन मिलेगा.” और जहां तक चयन प्रक्रिया की चर्चा सार्वजनिक करने की बात है. उन्होंने कहा, “आपको जजों पर भरोसा करना होगा.”

जजों के चयन के नए तंत्र को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

भारत सरकार ने 2014 में विपक्ष के मजबूत समर्थन के साथ नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (एनजेएसी) बिल पारित किया था. जिसके तहत कोलेजियम की जगह एक नई चयन प्रक्रिया प्रस्तावित की गई थी. जिसके अनुसार इस नई समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश के साथ दो सबसे वरिष्ठ जज, कानून मंत्री और न्यायपालिका से बाहर के दो “प्रतिष्ठित” व्यक्तियों का शामिल होना आवश्यक था.

लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस बिल को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि गैर-न्यायिक सदस्यों की भागीदारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता करेगी. जिला जज सीमा कहती हैं कि “जब भी कोई ऊपरी अदालतों की जवाबदेही पर सवाल उठाता है, वह स्वतंत्रता और मेरिट का मुद्दा उठा देते हैं. जिससे पारदर्शिता पीछे छूट जाती है. सुधारों के बिना सिस्टम में कुछ भी नहीं बदलेगा.”

हाल ही में गवई के रिटायर होने और 2026 में कई अन्य जजों के रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के पास अपनी विविधता सुधारने का एक अवसर जरूर होगा. लेकिन शायद इसकी शुरुआत यह मानने से होगी कि सिस्टम में बदलाव की जरूरत है. (dw.com/hi)



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वो अभिनेता जिसे देश के गांवों और छोटे शहरों के दर्शकों ने अपना सुपर स्टार माना

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वो अभिनेता जिसे देश के गांवों और छोटे शहरों के दर्शकों ने अपना सुपर स्टार माना


25-Nov-2025 9:58 PM

-यासिर उस्मान

वो दिसंबर 2005 की एक सुबह थी। मैं नया नया टीवी प्रोड्यूसर फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यू वाले शो की शूटिंग के लिए दिल्ली से मुंबई पहुंचा था।

उस दिन अभिनेता बॉबी देओल ने इंटरव्यू के लिए सुबह साढ़े ग्यारह बजे का समय दिया था। कैमरा क्रू और एंकर के साथ हम लोग करीब एक घंटा पहले ही मुंबई के जुहू में धर्मेंद्र के मशहूर बंगले पर पहुंच गए।

एंकर बॉबी देओल से मिलने चली गईं, कैमरा टीम ने गाड़ी से लाइट्स और दूसरा सामान उतारना शुरू कर दिया।

लकड़ी के बड़े से गेट से अंदर आते ही सबसे पहले मेरी नजर गेट के दूसरी तरफ फैले हरे-भरे लॉन पर पड़ी। कई पेड़ थे। उनके पास ही कई चमचमाती लग्जरी कारें खड़ी थीं।

सबसे पीछे एक काली फिएट कार थी। हाल ही में पॉलिश की हुई लग रही थी। बड़ी ब्रांड्स वाली बाकी गाडिय़ों के बीच वो फिएट किसी दूसरी दुनिया की चीज लग रही थी।

मैंने गार्ड से पूछा, ‘ये पुरानी फिएट किसकी है?’

वो मुस्कुराया, बोला, ‘धरम जी की पहली गाड़ी है साहब  आज भी चलती है।’

अपने लोगों के लिए ‘धरम जी’

गार्ड ने मुझे पास ही बने एक कमरे में बैठने को कहा। पुराने दौर की शाही गरिमा लिए हुए वो सुंदर ड्रॉइंग रूम था।

दीवारों पर लकड़ी के भारी पैनल थे। कमरे की एक दीवार पर युवा धर्मेंद्र की ख़ूबसूरत तस्वीर थी।

फ्रेम की हुई और भी कई नई-पुरानी तस्वीरें थीं। बीच में लकड़ी और कांच की बड़ी टेबल थी। बड़ा-सा कत्थई सोफा था जिस पर तीन लोग बैठे हुए नाश्ता कर रहे थे। ब्रेड और ऑमलेट।

बात हुई तो उन्होंने बताया कि वो लुधियाना से आए हैं। मैंने सुना था कि पंजाब में धर्मेंद्र के गांव के लोग या उनकी जान-पहचान वाले, जरूरत पडऩे पर मुंबई में सीधे धरम जी के घर पहुंच सकते हैं। उस दिन मैंने अपनी आँखों से ये देखा।

कुछ ही मिनट बाद धर्मेंद्र कमरे में दाखिल हुए। करीब सत्तर बरस के रहे होंगे उस समय, लेकिन बेहद फिट लग रहे थे और उनके मुस्कुराते हुए चेहरे पर एक अजीब-सा भोलापन था।

लोगों ने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखा और अपने खास अंदाज में बोले, ‘कैसे हो बेटे?’

एक पत्रकार के तौर पर मैं कई फिल्मी सितारों से मिल चुका था लेकिन उन तीन शब्दों में जो अपनापन महसूस हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था, मानो वो मुझे सालों से जानते हों।

मैंने उन्हें नमस्ते करते हुए अपना नाम बताया और ये भी कि मैं बॉबी के इंटरव्यू के लिए दिल्ली से आया हूं।

वो बोले, ‘दिल्ली में तो ठंड हो गई होगी, कितनी सुबह की फ्लाइट ली?’

मैंने कहा, ‘सुबह साढ़े पांच बजे की।’

वो हैरान हुए और फिर सवाल किया, ‘कुछ खाया तुमने?’

मैंने कहा कि सुबह फ्लाइट में कुछ खाया था। मैं उन्हें बताना चाहता था कि बचपन से लेकर अब तक मुझे उनकी ना जाने कितनी फिल्में देखकर कितना मजा आया है- ‘शोले’, ‘चुपके-चुपके’ से ‘गजब’ और ‘ग़ुलामी’ तक।

लेकिन मैं उस रोज बस उनके चेहरे को देखता रहा। और वह भी, कुछ पल, मुझे देखते रहे।

इसके बाद वो पंजाब से आए लोगों की तरफ मुड़ गए।

वो लोग किसी परिचित की सिफारिश लेकर आए थे जिनका नाम सुनते ही धर्मेंद्र पुरानी यादें साझा करने लगे।

बॉलीवुड का अजेय सितारा जिसकी चमक पूरे देश को दशकों से दीवाना बनाती रही, वो पंजाबी में बड़े अपनेपन से, गांव के पुराने दिन और किसी पुराने दोस्त को याद कर रहा था।

जब इंटरव्यू के दौरान नाराज़ हुए बॉबी

थोड़ी ही देर में सनी देओल भी वहां आए, मेजबान की तरह सबका हालचाल लेते हुए।

कुछ देर बाद अभय देओल भी मुस्कुराते हुए आए ‘हैलो’ कहने के लिए।

कोई दिखावा नहीं, कोई बनावट नहीं। उनके लिए तो एक बड़े पंजाबी संयुक्त परिवार वाली आम सुबह ही थी। लेकिन मेरे लिए यह यादगार सुबह थी। इतने सारे स्टार एक छत के नीचे।

उस पूरे माहौल के केंद्र में थे- धर्मेंद्र। सबकी नजरें, सबका आदर, बस उनकी ओर था।

मुझे बाद में किसी ने बताया कि अभय देओल हैं तो धर्मेंद्र के भतीजे लेकिन सनी और बॉबी की तरह वो भी धर्मेंद्र को ‘पापा’ कहकर पुकारते हैं जबकि अपने पिता को वो ‘चाचा’ कहकर पुकारते हैं।

पता चला कि पुराने पंजाबी परिवारों में अक्सर घर के मुखिया को सम्मान में पिता का दर्जा दिया जाता है।

तभी मेरी टीम का सदस्य मुझे बुलाने आया। मैंने धरम जी से इजाज़त ली।

उन्होंने बड़े प्यार से कहा, ‘जीते रहिए।’

हम बंगले के एक दूसरे कमरे की तरफ निकल पड़े जहां इंटरव्यू शूट किया जाना था।

बॉबी देओल के करियर और उनके जीवन पर बातचीत चल ही रही थी कि किसी निजी सवाल पर बॉबी बुरी तरह नाराज हो गए और इंटरव्यू रुक गया। बेहद खराब मूड में बॉबी ग़ुस्से में वहां से उठकर चले गए।

हमारी पूरी टीम बुरी तरह घबरा गई। पता नहीं वो आगे क्या करेंगे और चिंता अपने एपिसोड की भी थी जो अभी तक अधूरा था।

कुछ देर में सनी देओल आए, उन्होंने हमारी बात सुनी और बोले कि थोड़ी देर मामला ठंडा होने दो, फिर वो बॉबी को समझाएंगे।

तकरीबन एक घंटा बीत गया। हमें भूख भी लग रही थी।

बॉबी तो नहीं आए लेकिन उनके किचन से दो लोग बड़ी-बड़ी ट्रे में पूरी टीम के लिए कुछ लेकर आए।

लोग बोले, ‘धरम जी ने भेजा है।’

ट्रे में ब्रेड और ऑमलेट था, बिल्कुल घर जैसा। उन्हें याद था कि सुबह दिल्ली से सफऱ के बाद हम सीधे काम पर निकले थे।

 

‘सुपस्टार’ की आंधी के सामने टिके रहे धर्मेंद्र

कई साल बाद जब मैं अभिनेता राजेश खन्ना पर अपनी किताब लिख रहा था तो उस समय कई बार लेखक सलीम खान से मुलाकात हुई।

उन्होंने राजेश खन्ना के बेमिसाल स्टारडम की कई कहानियां सुनाईं। उन्होंने बताया कि कैसे राजेश खन्ना के कामयाबी की आंधी में इंडस्ट्री के सारे स्टार हिल गए थे सिवाय एक के। वो स्टार थे धर्मेन्द्र।

1969-1972, वो तीन साल जब राजेश खन्ना कामयाबी के शिखर पर थे तब धर्मेंद्र ही थे जो ‘जीवन मृत्य’, ‘राजा जानी’, ‘लोफऱ’, ‘सीता और गीता’ और ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी बड़ी बड़ी हिट फिल्में दे रहे थे और कॉमेडी से लेकर, रोमांस और एक्शन हर अंदाज़ में हिट थे।

सलीम खान ने बताया था, ‘लेकिन इतने बड़े स्टारडम के बावजूद धरम जी के लिए परिवार से ज़्यादा कुछ नहीं था।’

इसकी मिसाल देते हुए वो बोले कि ‘जंजीर’ की कहानी सबसे पहले धर्मेंद्र के पास गई थी।

उन्हें कहानी पसंद आई और 2500 रुपये में उन्होंने ये कहानी ले ली।

तय हुआ कि उस फिल्म में मुख्य भूमिका धर्मेंद्र निभाएंगे और उनके भाई अजीत सिंह देओल, प्रकाश मेहरा के साथ मिलकर इसके निर्माता होंगे।

लेकिन इसी दौरान धर्मेंद्र के एक रिश्तेदार की प्रकाश मेहरा से कोई अनबन हो गई। वो रिश्तेदार धर्मेंद्र के पास गए और अपने झगड़े के बारे में बताया।

उन्होंने धर्मेंद्र से कहा कि वो प्रकाश मेहरा के साथ काम ना करें। धर्मेंद्र ने उनकी बात मान ली।

उसी स्क्रिप्ट ने अमिताभ बच्चन को स्टार बना दिया और उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में पहचान दिलाई।

बॉलीवुड में शाहरुख़ की एंट्री में बड़ा रोल

1990 के दशक की शुरुआत में, दिल्ली से आए एक टीवी एक्टर शाहरुख खान बॉलीवुड में अपने बड़े मौके की तलाश में थे।

हेमा मालिनी उन्हें अपनी फिल्म ‘दिल आशना है’ में लॉन्च करने पर विचार कर रही थीं। उन्होंने शाहरुख को मिलने के लिए बुलाया।

शाहरुख की ‘शाही नाक’ तो उन्हें पसंद आई, लेकिन वह अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थीं।

उनका मानना था कि शाहरुख खान पारंपरिक बॉलीवुड हीरो की छवि में पूरी तरह फिट नहीं बैठते।

पास ही, लुंगी पहने धर्मेंद्र शांत बैठकर उनकी बातचीत सुन रहे थे। उस नर्वस नौजवान के चेहरे पर मासूमियत और आंखों में चिंगारी शायद धर्मेंद्र को नजर आ गई थी।

कुछ पल सोचने के बाद धर्मेंद्र ने हेमा से कहा कि उन्हें शाहरुख को मौका देना चाहिए।

सालों बाद, शाहरुख ने बताया था कि फिल्म की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र उनके पास आए और कहा, ‘तू खुद को इंडस्ट्री में अकेला मत समझना। कोई कुछ भी कहे तो बोलना, तेरे सर पर धर्मेंद्र का हाथ है। कुछ भी हो, मैं हूं।’

कभी नहीं मिला ‘बेस्ट एक्टर’ का अवॉर्ड

धर्मेंद्र ने 250 से भी ज़्यादा फिल्मों में काम किया। किसी भी बॉलीवुड स्टार से ज्यादा हिट फिल्में उनके नाम हैं, लेकिन उन्हें कभी ‘बेस्ट एक्टर’ का फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं मिला। इसका मलाल भी उन्हें सालों साल तक रहा।

लेकिन सरलता देखिए, जब 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया तो धर्मेंद्र मंच पर ही बोले, ‘मैं पिछले 37 साल से इस फिल्मफेयर अवॉर्ड की ट्रॉफी का इंतजार करता था, लेकिन यह मुझे कभी नहीं मिली।’

उन्होंने कहा, ‘हर साल मैं एक नया सूट सिलवाता था और उसकी मैचिंग टाई भी लेता था, सिर्फ इस उम्मीद में कि क्या पता मुझे अवॉर्ड लेने के लिए बुला लें। कुछ सालों के बाद मैंने उम्मीद छोड़ दी।’

अंग्रेजी में शायद इसी को ‘पोएटिक जस्टिस’ कहते हैं कि उस रात जिस सितारे ने उन्हें ट्रॉफी सौंपी, वह भारतीय सिनेमा के महानतम अभिनेताओं में से एक और धर्मेंद्र के आदर्श, दिलीप कुमार थे।

उन्हें अवॉर्ड चाहे न मिले हों लेकिन 60 साल लंबे करियर में उनके फैन बरकरार रहे।

वैसे तो उनकी लोकप्रियता पूरे देश में फैली हुई थी, लेकिन सबसे ज़्यादा प्यार उन्हें देश के गांवों और छोटे शहरों के दर्शकों ने दिया।

आज भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में किसी से पूछेंगे कि धर्मेंद्र ने क्या कमाया तो जवाब होगा-‘इज़्जत और गुडविल।’

2005 की उस सुबह इंटरव्यू तो हमने बॉबी देओल का किया था लेकिन जब मैं वहां से निकला तो मैं धर्मेंद्र का और भी बड़ा फैन बन गया था।

अपने गांव और लोगों से अपनापन हो, या चालीस साल पुरानी अपने जीवन की पहली सेकंड हैंड कार, धर्मेंद्र ने सब स्नेह से साथ संजोकर रखा था, मानो ये उनकी जड़ों का हिस्सा हो।

लुधियाना के नसराली गांव का बड़े दिल वाला वो लडक़ा, चमक-दमक भरी फिल्मी दुनिया को जीतने के बाद भी अपनी जड़ों से कभी दूर नहीं हुआ।

एक गांव उसके भीतर हमेशा बसा रहा। धर्मेंद्र साधारण भी थे और असाधारण भी। (bbc.com/hindi)



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कीर्ति नारायण द्विवेदी का निधन

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कीर्ति नारायण द्विवेदी का निधन


25-Nov-2025 10:00 PM

रायपुर, 25 नवंबर। inh 24×7- हरिभूमि मीडिया समूह के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के पिता  कीर्तिनारायण द्विवेदी का मंगलवार को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद पं. बृजनारायण ‘बृजेश’ के मंझले पुत्र थे। लंबे समय तक वे मध्यप्रदेश शासन में कृषि विभाग में अधिकारी के रूप में सेवाएं देते रहे और अपने कार्यकाल में अपनी निष्ठा, सरलता और सेवा भावना के लिए जाने जाते थे।

उनकी अंतिम यात्रा 26 नवंबर, बुधवार, को उनके निज निवास 3, सिंधी कॉलोनी, ग्वालियर से लक्ष्मीगंज मुक्तिधाम के लिए प्रस्थान करेगी। स्वर्गीय कीर्तिनारायण द्विवेदी अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने कीर्ति नारायण द्विवेदी के निधन पर शोक व्यक्त किया है।



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