Batwara 1947 Review : 1947 का वो बंटवारा… जिसने सिर्फ सरहद नहीं, लाखों दिलों को भी बांट दिया था।
सनी देओल फिर लौटे हैं, लेकिन इस बार दुश्मन से लड़ने नहीं… इंसानियत बचाने!
शबाना आजमी और सनी देओल का रिश्ता फिल्म की सबसे भावुक कड़ी बनकर सामने आता है।
‘बंटवारा 1947’ देखकर आंखें नम होंगी या फिल्म उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी? पढ़िए पूरा रिव्यू…
कहानी क्या है?

राजकुमार संतोषी की ‘बंटवारा 1947’ 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौर में इंसानी रिश्तों, विस्थापन, डर और इंसानियत की कहानी कहती है। फिल्म की कहानी सिकंदर मिर्जा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने परिवार के साथ लखनऊ से लाहौर पहुंचता है। वहां उसे एक ऐसी हवेली मिलती है, जिसे उसके हिंदू मालिक छोड़कर जा चुके हैं।
लेकिन कहानी यहीं एक बड़ा मोड़ लेती है।
हवेली में एक बुजुर्ग हिंदू महिला पहले से मौजूद है। वह उस घर को अपना पुश्तैनी घर बताती है और उसे छोड़ने से इनकार कर देती है। एक ही छत के नीचे दो धर्मों और दो परिवारों का यह टकराव धीरे-धीरे सिर्फ मकान के मालिकाना हक का मामला नहीं रहता, बल्कि बंटवारे के बीच इंसानियत और रिश्तों की बड़ी कहानी बन जाता है। )
सनी देओल इस बार अलग अंदाज में
सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी का नाम आते ही ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों की याद आती है। करीब तीन दशक बाद दोनों की वापसी ने स्वाभाविक रूप से उम्मीदें बढ़ा दी हैं। लेकिन इस फिल्म में संतोषी ने सनी देओल की ताकत को सिर्फ गुस्से और एक्शन तक सीमित नहीं रखा।
सिकंदर मिर्जा के किरदार में सनी का संघर्ष बाहरी दुश्मन से ज्यादा परिस्थितियों से है। यही बदलाव फिल्म को उनके पुराने किरदारों से अलग करता है। शुरुआती प्रतिक्रियाओं में भी सनी के प्रदर्शन को प्रभावशाली बताया गया है।
और शायद यही फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू है—सनी देओल की ताकत इस बार उनकी आवाज की ऊंचाई नहीं, बल्कि उनके किरदार की भावनात्मक मजबूती है।
शबाना आजमी ने संभाली फिल्म की भावनात्मक कमान
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अगर किसी एक कलाकार को कहा जाए तो शबाना आजमी का नाम सबसे आगे आता है।
वह फिल्म में ‘माई’ का किरदार निभा रही हैं। उनका किरदार बंटवारे के उस दर्द को सामने लाता है, जिसमें इंसान अपना घर, जमीन, परिवार और पहचान तक खो देता है। सनी देओल के किरदार के साथ उनका रिश्ता कहानी को एक अलग भावनात्मक गहराई देता है।
ट्रेलर लॉन्च के दौरान शबाना आजमी ने फिल्म के एक बेहद कठिन दृश्य को याद करते हुए भावुक होकर बताया था कि उस सीन को करना उनके लिए बेहद अपमानजनक और कठिन अनुभव था और उस दौरान सनी देओल उनके लिए सहारा बने)
यही वजह है कि फिल्म में सनी और शबाना के बीच का रिश्ता कहानी की सबसे असरदार कड़ी बनता है।
प्रीति जिंटा की वापसी भी खास
प्रीति जिंटा लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर सनी देओल के साथ दिखाई दे रही हैं। वह सिकंदर मिर्जा की पत्नी हमीदा के किरदार में हैं।
उनकी मौजूदगी फिल्म में परिवार और भावनात्मक संघर्ष को मजबूती देती है। शुरुआती प्रतिक्रियाओं में प्रीति की स्क्रीन प्रेजेंस को भी सकारात्मक बताया गया है।
सनी और प्रीति की जोड़ी को दर्शकों ने पहले भी पसंद किया है और इस फिल्म में उनका रिश्ता कहानी के पारिवारिक हिस्से को आगे बढ़ाता है।
फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट—‘इंसानियत’
‘बंटवारा 1947’ को सिर्फ एक और पार्टिशन फिल्म समझना सही नहीं होगा।
फिल्म का मूल सवाल यह है कि जब धर्म, राजनीति और सरहदें इंसानों को बांट देती हैं, तब इंसान को इंसान से जोड़कर क्या रखता है?
फिल्म का प्रचार भी इसी विचार पर केंद्रित रहा है। निर्माताओं की ओर से जारी सामग्री में इसे डर और नफरत के बीच साहस और इंसानियत की कहानी के रूप में पेश किया गया है।
यानी फिल्म का जोर सिर्फ दंगों, हिंसा और विस्थापन को दिखाने पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर है जिन्होंने उस भयावह दौर में भी इंसानियत नहीं छोड़ी।
संतोषी की वापसी कितनी असरदार?
राजकुमार संतोषी की फिल्मों में भावनात्मक ड्रामा और मजबूत किरदार हमेशा अहम रहे हैं। यहां भी उन्होंने एक बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम को कुछ किरदारों के निजी संघर्ष के जरिए दिखाने की कोशिश की है।
फिल्म असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्याई नई’ पर आधारित है। कहानी की बुनियाद ही ऐसी है जिसमें एक हवेली दो समुदायों के बीच बदलती परिस्थितियों का प्रतीक बन जाती है।
यही वजह है कि फिल्म का ड्रामा सिर्फ युद्ध या राजनीतिक घटनाओं से नहीं, बल्कि घर के भीतर पैदा होने वाले तनाव से बनता है।
तकनीकी पक्ष
फिल्म को पीरियड लुक देने के लिए बड़े स्तर पर काम किया गया है। सिनेमैटोग्राफी संतोष सिवन ने संभाली है, जबकि संगीत ए.आर. रहमान का है और गीत जावेद अख्तर ने लिखे हैं। साउंड डिजाइन की जिम्मेदारी रेसुल पुकुट्टी के पास है।
इस टीम से स्वाभाविक रूप से फिल्म के दृश्य और संगीत दोनों को लेकर उम्मीदें बढ़ती हैं।
क्या फिल्म हर दर्शक को पसंद आएगी?
यहां थोड़ा सावधान रहना होगा।
अगर कोई दर्शक सनी देओल की फिल्म में लगातार ‘गदर’ जैसा एक्शन, बड़े संवाद और बदले की कहानी खोज रहा है तो उसे फिल्म की रफ्तार अलग लग सकती है।
लेकिन अगर आप ऐतिहासिक घटनाओं के बीच इंसानी रिश्ते, भावनाएं, परिवार, विस्थापन और इंसानियत वाली कहानी पसंद करते हैं तो फिल्म ज्यादा असर छोड़ सकती है।
यही इस फिल्म की ताकत भी है और संभावित कमजोरी भी।
कहानी का भावनात्मक पक्ष मजबूत है, लेकिन कुछ दर्शकों को इसका गंभीर और ड्रामा-केंद्रित ट्रीटमेंट अपेक्षाकृत धीमा महसूस हो सकता है।
सनी देओल बनाम ‘गदर’—सबसे बड़ा फर्क
‘गदर’ में सनी देओल का तारा सिंह अपने परिवार को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था से भिड़ जाता है।
‘बंटवारा 1947’ में सिकंदर मिर्जा के सामने लड़ाई कुछ और है।
यहां सवाल है—जब पूरा समाज टूट रहा हो तो क्या इंसान अपने भीतर की इंसानियत को बचा सकता है?
यही फर्क दोनों फिल्मों को अलग करता है।
सनी देओल फिर रक्षक की भूमिका में हैं, लेकिन इस बार उनका सबसे बड़ा हथियार सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि संवेदना है।
अंतिम फैसला
‘बंटवारा 1947’ सनी देओल की सामान्य एक्शन फिल्म नहीं है। यह बंटवारे के जख्मों को रिश्तों और इंसानियत के जरिए देखने की कोशिश करती है।
सनी देओल का गंभीर अभिनय, शबाना आजमी की भावनात्मक ताकत, प्रीति जिंटा की वापसी और राजकुमार संतोषी की कहानी कहने की शैली फिल्म को खास बनाती है।
फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह बंटवारे को सिर्फ हिंदू-मुस्लिम संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि उन आम इंसानों की त्रासदी के रूप में देखने की कोशिश करती है जिनसे उनका घर और पहचान छीन ली गई थी।
किसके लिए देखें?
सनी देओल के फैंस, पार्टिशन पर बनी फिल्मों के दर्शक और गंभीर भावनात्मक सिनेमा पसंद करने वाले दर्शक इसे जरूर देख सकते हैं।
⭐ मेरी रेटिंग: 3.5/5
एक लाइन में:
‘बंटवारा 1947’ सरहद की कहानी कम और उस सरहद के बीच जिंदा बची इंसानियत की कहानी ज्यादा है।




