जांजगीर–चांपा। CG NEWS:बम्हनीडीह ब्लॉक के ग्राम अफरीद की पाँच बहनों ने पैरा यानी पराली से न सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि हजारों ग्रामीण महिलाओं और युवतियों को रोजगार का रास्ता भी दिखाया है।
आमतौर पर धान की मिसाई के बाद पैरा को या तो जला दिया जाता है या खाद और चारे के रूप में उपयोग किया जाता है, लेकिन अफरीद गांव की धनेश्वरी बनाफर और उनकी बहनों ने इसी पैरा से कला को जोड़कर एक नई मिसाल कायम की है।
पैरा आर्ट के ज़रिए ये बहनें ग्रामीण महिलाओं और युवतियों को हुनरमंद बना रही हैं। आज उनकी बनाई पैरा आर्ट न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में अपनी पहचान बना चुकी है। अब तक पाँच हजार से अधिक महिलाओं और युवतियों को पैरा आर्ट का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा चुका है।
कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर–चांपा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. के.डी. महंत बताते हैं कि कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा कृषि से जुड़े प्रशिक्षण के साथ-साथ पैरा के सही उपयोग को लेकर भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिससे किसानों और ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का साधन मिल सके।
वहीं पैरा आर्टिस्ट धनेश्वरी बनाफर बताती हैं कि छत्तीसगढ़ हस्तशिल्प विकास बोर्ड के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं और लड़कियों को यह कला बिल्कुल निःशुल्क सिखाई जाती है। तीन महीने के इस कोर्स के लिए किसी शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं होती, सिर्फ उम्र 18 से 45 वर्ष के बीच होनी चाहिए। पैरा से बनी एक पेंटिंग पर 50 से 100 रुपये का खर्च आता है, जिसे कलाकार 500 रुपये से लेकर हजारों रुपये में बेच सकते हैं।
धनेश्वरी की मां बिसाहीन बाई बनाफर गर्व से कहती हैं कि उनकी पाँचों बेटियां आज पैरा आर्ट के ज़रिए अपने पैरों पर खड़ी हैं और दूसरी बेटियों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही हैं।




