Thursday, June 4, 2026
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350 करोड़ की ‘पेद्दी’ में राम चरण का तूफान

MOVIE REVIEW: दक्षिण भारतीय सिनेमा जब भी किसी बड़े कैनवास पर गांव, संघर्ष और खेल को साथ लेकर आता है तो उम्मीदें अपने आप बढ़ जाती हैं। ‘उप्पेना’ जैसी सफल फिल्म देने वाले निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने इस बार राम चरण के साथ मिलकर ‘पेद्दी’ के रूप में एक ऐसी कहानी पेश की है, जो सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि पहचान, सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई की कहानी है।

करीब 350 करोड़ रुपये के भारी-भरकम बजट में बनी यह फिल्म राम चरण के करियर की सबसे महत्वाकांक्षी फिल्मों में गिनी जा रही है। इसके लिए अभिनेता ने लगभग दो साल का समय दिया और इसका असर पर्दे पर साफ दिखाई देता है। हालांकि फिल्म जहां अभिनय, तकनीक और भावनात्मक दृश्यों में चमकती है, वहीं इसकी पटकथा कई जगह दर्शकों को निराश भी करती है।

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कहानी: एक गांव की पहचान की लड़ाई

फिल्म की कहानी आंध्र प्रदेश के एक पिछड़े और उपेक्षित गांव से शुरू होती है। यह ऐसा गांव है जिसका नाम सरकारी रिकॉर्ड और देश के नक्शे में तक दर्ज नहीं है। गांव के लोगों के पास पहचान पत्र नहीं हैं, इसलिए वे मतदान भी नहीं कर सकते।

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इसी गांव में रहता है राजू उर्फ पेद्दी (राम चरण), जो निम्न जाति से आने वाला एक मेहनतकश मजदूर है। उसके भीतर अपने गांव को पहचान दिलाने और सम्मानजनक जीवन दिलाने की जिद है।

गांव के बुजुर्ग अप्पलासूरी (जगपति बाबू) पिछले 30 वर्षों से रेलवे अधिकारियों से सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि उनके गांव में एक मिनट के लिए ट्रेन रुक जाए, ताकि दुनिया को पता चल सके कि यह गांव भी अस्तित्व में है। लेकिन व्यवस्था की बेरुखी और जातिगत भेदभाव के कारण उनकी हर कोशिश नाकाम होती रही है।

कहानी तब नया मोड़ लेती है जब क्रिकेट गांव के संघर्ष का हथियार बन जाता है। पेद्दी और उसके साथी खेल के मैदान में उतरकर अपने गांव को पहचान दिलाने की लड़ाई शुरू करते हैं। यहीं से फिल्म भावनात्मक और प्रेरणादायक मोड़ लेती है।

राम चरण: करियर की सबसे दमदार परफॉर्मेंस

अगर ‘पेद्दी’ देखने की सबसे बड़ी वजह कोई है तो वह राम चरण हैं।

उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया बल्कि किरदार को जिया है। गांव के मजदूर की शारीरिक भाषा, चेहरे की कठोरता, भावनात्मक दृश्यों में दर्द और मैदान पर खिलाड़ी का जुनून—हर पहलू में राम चरण प्रभाव छोड़ते हैं।

कई दृश्यों में उनकी आंखें संवादों से ज्यादा बोलती हैं। खासकर गांव के अपमान और संघर्ष वाले सीक्वेंस दर्शकों को भावुक कर देते हैं। यह निस्संदेह उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में से एक मानी जाएगी।

निर्देशन: बुच्ची बाबू का विजन शानदार

निर्देशक बुच्ची बाबू सना का विजन बेहद बड़ा और महत्वाकांक्षी है। उन्होंने गांव की गरीबी, जातिगत भेदभाव और खेल के जुनून को बड़े पैमाने पर पर्दे पर उतारा है।

फिल्म के कई दृश्य सिनेमाई तौर पर बेहद प्रभावशाली हैं। विशेष रूप से क्रिकेट मैचों के सीक्वेंस और गांव के संघर्ष वाले दृश्य दर्शकों को बांधे रखते हैं।

हालांकि समस्या तब आती है जब फिल्म दूसरे हाफ में जरूरत से ज्यादा लंबी और भावुक होने लगती है। कुछ हिस्से दोहराव का शिकार भी दिखाई देते हैं।

लेखन और पटकथा: सबसे कमजोर कड़ी

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है।

जिस कहानी में भावनात्मक विस्फोट और सामाजिक संघर्ष की अपार संभावनाएं थीं, उसे पूरी मजबूती से विकसित नहीं किया गया। कई महत्वपूर्ण किरदार अधूरे लगते हैं और कुछ घटनाएं जल्दबाजी में आगे बढ़ती हैं।

दूसरे हाफ में फिल्म का प्रभाव बार-बार टूटता है। जहां दर्शक एक मजबूत क्लाइमेक्स की उम्मीद करते हैं, वहां पटकथा उतनी धार नहीं दिखा पाती।

संगीत और बैकग्राउंड स्कोर

फिल्म का संगीत इसकी सबसे बड़ी ताकतों में शामिल है।

लोक संगीत और भावनात्मक धुनों का मिश्रण कहानी को मजबूती देता है। बैकग्राउंड स्कोर कई दृश्यों को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है। क्रिकेट मैचों और संघर्ष वाले सीक्वेंस में संगीत रोमांच को कई गुना बढ़ा देता है।

हालांकि सभी गाने यादगार नहीं बन पाते, लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है।

तकनीकी पक्ष

सिनेमैटोग्राफी फिल्म का शानदार पहलू है। गांव की धूलभरी गलियों, खेतों और मैदानों को बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है।

प्रोडक्शन डिजाइन और सेट्स पर भारी बजट का असर साफ दिखाई देता है। विजुअल क्वालिटी किसी भी स्तर पर समझौता करती नजर नहीं आती।

एडिटिंग थोड़ी और कसावट मांगती थी, खासकर दूसरे हाफ में।

सह कलाकारों का काम

जगपति बाबू अपने किरदार में प्रभावशाली हैं। गांव के बुजुर्ग और संघर्षशील व्यक्ति के रूप में उनका अभिनय फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।

अन्य कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है, हालांकि अधिकांश फोकस राम चरण पर ही केंद्रित रहता है।

क्या फिल्म देखने लायक है?

अगर आप दमदार अभिनय, बड़े पैमाने का सिनेमा और भावनात्मक स्पोर्ट्स ड्रामा पसंद करते हैं तो ‘पेद्दी’ आपको जरूर पसंद आएगी।

लेकिन अगर आप बेहद कसावट वाली पटकथा और पूरी तरह संतुलित कहानी की उम्मीद लेकर जा रहे हैं तो कुछ निराशा हाथ लग सकती है।

अंतिम फैसला

‘पेद्दी’ एक ऐसी फिल्म है जो दिल जीतती है, लेकिन पूरी तरह दिमाग पर कब्जा नहीं कर पाती। राम चरण की शानदार अदाकारी, भव्य निर्माण और मजबूत भावनात्मक दृश्यों के बावजूद कमजोर लेखन इसे महान फिल्म बनने से रोक देता है।

फिर भी बड़े पर्दे पर देखने लायक यह एक प्रभावशाली अनुभव है, जो संघर्ष, पहचान और सपनों की कहानी को भव्यता के साथ पेश करती है।

फाइनल रेटिंग: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)

क्या अच्छा है: राम चरण का अभिनय, विजुअल्स, बैकग्राउंड स्कोर, भावनात्मक दृश्य।

क्या कमजोर है: पटकथा, लंबा दूसरा हाफ और कुछ अधूरे किरदार।

वन लाइनर: “राम चरण चमके, लेकिन कहानी उतनी ऊंची उड़ान नहीं भर पाई जितनी ‘पेद्दी’ से उम्मीद थी।”

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