ग्लासगो की सफलता से एशियाई खेलों तक: भारतीय मुक्केबाज़ी टीम में बदला माहौल और बढ़ा आत्मविश्वास

भारतीय मुक्केबाज़ी टीम के लिए हाल के महीनों में केवल रिंग के अंदर ही नहीं, बल्कि रिंग के बाहर भी काफी कुछ बदला है। खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के तरीके से लेकर आपसी तालमेल और टीम के माहौल तक, भारतीय मुक्केबाज़ी में एक नई सोच दिखाई दे रही है। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में शानदार प्रदर्शन के बाद टीम का आत्मविश्वास काफी बढ़ा है और अब उसकी नजरें जापान में होने वाले एशियाई खेलों पर टिकी हैं।
भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम के मुख्य कोच सीए कुट्टप्पा इस बदले हुए माहौल से काफी खुश हैं। टीम में खिलाड़ियों के तनाव को कम करने और उन्हें रोजमर्रा की कड़ी ट्रेनिंग से थोड़ा ब्रेक देने के लिए समय-समय पर मनोरंजक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं।
कुट्टप्पा मुस्कुराते हुए बताते हैं कि टीम की पिछली ऐसी शाम समुद्र तट की थीम पर आयोजित की गई थी और उसमें उन्होंने पहला पुरस्कार भी जीता था। उनका कहना है कि ऐसी गतिविधियों का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि खिलाड़ियों को लगातार चल रही कठिन ट्रेनिंग और प्रतियोगिता के दबाव से कुछ समय के लिए बाहर निकालना भी है। साथ ही, इन गतिविधियों के जरिए खिलाड़ी एक-दूसरे के और करीब आते हैं तथा टीम में बेहतर तालमेल बनता है।
इन मनोरंजक कार्यक्रमों में खिलाड़ियों को दिए जाने वाले पुरस्कार भी काफी दिलचस्प रहे हैं। कभी चॉकलेट्स पुरस्कार के रूप में दी गईं, तो कभी यूनो कार्ड्स का पैक या फिर छोटे-छोटे बॉक्सिंग ग्लव्स पुरस्कार में रखे गए। देखने में ये छोटी चीजें लग सकती हैं, लेकिन टीम के माहौल को हल्का-फुल्का और सकारात्मक बनाए रखने में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
हालांकि, अगस्त से टीम के लिए एक बड़ी जश्न की शाम आयोजित करने की तैयारी चल रही थी। इसका मकसद ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाज़ी दल के शानदार प्रदर्शन का जश्न मनाना था। लेकिन फिलहाल इस कार्यक्रम को रोक दिया गया है। टीम के सामने अब एक और बड़ी चुनौती है और वह है एशियाई खेल।
एशियाई खेल 19 सितंबर से 4 अक्टूबर तक आइची-नागोया, जापान में आयोजित होने हैं। राष्ट्रमंडल खेलों की तुलना में एशियाई खेलों में प्रतिस्पर्धा कहीं अधिक कठिन मानी जाती है। एशिया में मुक्केबाज़ी का स्तर काफी ऊंचा है और भारतीय मुक्केबाज़ों को मजबूत अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के खिलाफ रिंग में उतरना होगा। ऐसे में ग्लासगो में मिली सफलता को दोहराने के बजाय उससे आगे बढ़ना भारतीय टीम का लक्ष्य होगा।
महिला टीम ने कायम रखा शानदार प्रदर्शन

ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला मुक्केबाज़ों ने शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय महिला टीम ने कुल पांच स्वर्ण पदक और एक रजत पदक अपने नाम किया। यह प्रदर्शन इस बात का प्रमाण था कि भारतीय महिला मुक्केबाज़ी लगातार मजबूत हो रही है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम कर चुकी है।
महिला टीम लंबे समय से भारतीय मुक्केबाज़ी की मजबूत कड़ी रही है। लेकिन ग्लासगो में सबसे अधिक ध्यान जिस बात ने खींचा, वह भारतीय पुरुष टीम का प्रदर्शन था। युवा पुरुष मुक्केबाज़ों ने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हुए दो स्वर्ण और दो रजत पदक जीते।
यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे ठीक एक साल पहले भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ विश्व चैंपियनशिप में एक भी पदक जीतने में नाकाम रहे थे। 12 वर्षों में यह पहला मौका था जब भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम विश्व चैंपियनशिप से बिना किसी पदक के लौटी थी। ऐसे में ग्लासगो में मिला सुधार केवल पदकों की संख्या नहीं था, बल्कि यह टीम के प्रदर्शन और मानसिकता में आए बदलाव का संकेत भी था।
कुट्टप्पा ने भी स्वीकार किया कि उन्हें खुद इस तरह के परिणाम की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने माना कि टीम के लड़कों ने असाधारण प्रदर्शन किया और ग्लासगो में मिली सफलता ने सभी को उत्साहित किया।
प्रशिक्षण के तरीके में किया गया बड़ा बदलाव
सीए कुट्टप्पा को जनवरी में भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम का मुख्य कोच दोबारा नियुक्त किया गया। यह राष्ट्रीय कोच के रूप में उनका तीसरा कार्यकाल है। जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने महिला टीम के कोच सैंटियागो नीवा के साथ मिलकर खिलाड़ियों की ट्रेनिंग और प्रदर्शन विश्लेषण के तरीके में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए।
कुट्टप्पा के मुताबिक पहले आमतौर पर खिलाड़ी ट्रेनिंग के लिए आते थे, स्पैरिंग करते थे और फिर वापस चले जाते थे। यानी प्रशिक्षण का एक बड़ा हिस्सा केवल रिंग में अभ्यास तक सीमित था। इस व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी यह थी कि स्पैरिंग के दौरान हुई गलतियों और अच्छी चीजों का विस्तृत विश्लेषण नहीं किया जाता था।
नई व्यवस्था में कोचिंग स्टाफ को स्पैरिंग सत्रों को ध्यान से देखने और उनका वीडियो रिकॉर्ड करने के बाद उसका विश्लेषण करने के लिए कहा गया। इसके बाद खिलाड़ियों को बुलाकर उन्हें विस्तार से बताया जाता था कि उन्होंने कहां अच्छा प्रदर्शन किया और किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।
इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी किया गया कि खिलाड़ियों के सामने केवल उनकी गलतियों की सूची नहीं रखी जाती थी। कोचिंग टीम सकारात्मक पहलुओं पर भी अधिक जोर देती थी। यानी खिलाड़ी को यह बताया जाता था कि उसने क्या सही किया, उसकी ताकत क्या है और उन अच्छी चीजों को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है।
इसके बाद गलतियों को सुधारने के लिए विशेष अभ्यास कराया जाता था। इस तरह प्रशिक्षण केवल शारीरिक मेहनत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खिलाड़ियों के तकनीकी, मानसिक और रणनीतिक विकास पर भी ध्यान दिया जाने लगा।
जीत से ज्यादा प्रदर्शन पर ध्यान
कुट्टप्पा द्वारा किए गए बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव शायद यह था कि खिलाड़ियों के सामने हर मुकाबले में केवल जीत हासिल करने का लक्ष्य रखने के बजाय प्रदर्शन को प्राथमिकता दी गई।
उनका मानना था कि अगर किसी मुक्केबाज़ से हर बार केवल जीतने की उम्मीद की जाए, तो उसके मन में हार का डर पैदा हो सकता है। हार के डर के कारण खिलाड़ी अपनी स्वाभाविक शैली में प्रदर्शन करने के बजाय परिणाम के बारे में सोचने लगता है।
इसके बजाय टीम प्रबंधन ने खिलाड़ियों के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया तैयार की। मुक्केबाज़ों से कहा गया कि वे रिंग में अपनी तकनीक और बुनियादी चीजों पर ध्यान दें। पंच सही जगह लगाना, डिफेंस मजबूत रखना, ब्लॉक सही तरीके से करना और मुकाबले के दौरान लगातार संघर्ष करते रहना उनकी प्राथमिकता बनाई गई।
कुट्टप्पा की सोच साफ है—अगर खिलाड़ी अपनी बुनियादी तकनीक को सही तरीके से लागू करता है और पूरे मुकाबले में मजबूती से लड़ता है, तो परिणाम धीरे-धीरे अपने आप आने लगेंगे। यहां तक कि अगर किसी मुकाबले में हार भी मिलती है, लेकिन प्रदर्शन मजबूत रहता है, तो वह हार भी सीखने का अवसर बन सकती है।
यह मानसिक बदलाव भारतीय पुरुष टीम के प्रदर्शन में भी नजर आया और ग्लासगो में टीम के मुक्केबाज़ों ने कई कड़े मुकाबलों में शानदार जुझारूपन दिखाया।
ग्लासगो में पुरुष मुक्केबाज़ों ने दिखाया दम
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम के लिए सचिन सिवाच ने 60 किलोग्राम भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने फाइनल में कड़ी चुनौती का सामना करते हुए जीत हासिल की।
80 किलोग्राम भार वर्ग में अंकुश पंघाल ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। दोनों खिलाड़ियों की जीत ने भारतीय पुरुष टीम के प्रदर्शन को मजबूती दी और टीम के आत्मविश्वास को बढ़ाया।
इसके अलावा जदुमणि सिंह ने 55 किलोग्राम भार वर्ग में रजत पदक जीता, जबकि नरेंद्र बेरवाल ने 90 किलोग्राम से अधिक भार वर्ग में रजत पदक हासिल किया।
अब ग्लासगो में शानदार प्रदर्शन करने वाले इन खिलाड़ियों के साथ सुमित कुंडू और कपिल पोखरिया भी एशियाई खेलों में भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम का हिस्सा होंगे। इस तरह भारत की पुरुष टीम के पास ग्लासगो की सफलता को एशियाई स्तर पर दोहराने का एक मजबूत मौका है।
पुरुष और महिला टीम के बीच बढ़ी एकजुटता
भारतीय मुक्केबाज़ी टीम में बदलाव केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा। कोचिंग स्टाफ ने खिलाड़ियों के बीच आपसी तालमेल और टीम भावना को मजबूत करने पर भी काफी ध्यान दिया।
पुरुष और महिला दोनों टीमों के खिलाड़ी एक साथ ट्रेनिंग करते हैं। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भी दोनों टीमों के खिलाड़ियों ने एक-दूसरे का लगातार समर्थन किया।
जब महिला मुक्केबाज़ रिंग में उतरती थीं, तो पुरुष टीम के खिलाड़ी उनका उत्साह बढ़ाते थे। इसी तरह पुरुष मुक्केबाज़ों के मुकाबलों के दौरान महिला टीम भी उनके समर्थन में मौजूद रहती थी।
कुट्टप्पा के अनुसार, इस प्रक्रिया ने खिलाड़ियों के बीच मजबूत रिश्ता बनाया है। अब टीम के भीतर सिर्फ अलग-अलग खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे का समर्थन करने वाला एक समूह तैयार हुआ है। खिलाड़ियों के बीच यह भावना कि वे एक परिवार की तरह हैं, मुश्किल मुकाबलों के दौरान मानसिक मजबूती देने में काफी मदद कर सकती है।
अब जापान में असली परीक्षा
ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के शानदार प्रदर्शन ने भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम को नई उम्मीद दी है। पिछले वर्ष विश्व चैंपियनशिप में पदक न जीत पाने के बाद जिस टीम पर सवाल उठ रहे थे, वही टीम अब एशियाई खेलों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लेकर उतर रही है।
हालांकि, एशियाई खेलों की चुनौती आसान नहीं होगी। एशिया में मुक्केबाज़ी का स्तर काफी ऊंचा है और भारतीय खिलाड़ियों को मजबूत और अनुभवी मुक्केबाज़ों का सामना करना पड़ेगा। इसलिए ग्लासगो में मिली सफलता को एशियाई खेलों में दोहराना भारतीय टीम के लिए बड़ी चुनौती होगी।
कुट्टप्पा और उनका कोचिंग स्टाफ फिलहाल खिलाड़ियों को इसी चुनौती के लिए तैयार कर रहा है। लक्ष्य केवल पदक जीतना नहीं, बल्कि हर मुकाबले में बेहतर तकनीक, मजबूत डिफेंस और आक्रामक मानसिकता के साथ उतरना है।
भारतीय मुक्केबाज़ी का इतिहास भी बताता है कि एशियाई खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना आसान नहीं रहा है। भारतीय मुक्केबाज़ों ने अब तक एशियाई खेलों में कुल आठ स्वर्ण पदक जीते हैं। इनमें से दो स्वर्ण पदक महान मुक्केबाज़ हवा सिंह ने 1966 और 1970 के एशियाई खेलों में हासिल किए थे।
ऐसे इतिहास के बीच भारतीय टीम की मौजूदा पीढ़ी के सामने एक बड़ा अवसर है। ग्लासगो ने पुरुष टीम को आत्मविश्वास दिया है, महिला टीम पहले से ही मजबूत स्थिति में है और कोचिंग स्टाफ ने प्रशिक्षण के साथ-साथ खिलाड़ियों की मानसिकता और टीम बॉन्डिंग पर भी काम किया है।
अब सभी की निगाहें जापान पर होंगी। यदि भारतीय मुक्केबाज़ ग्लासगो के प्रदर्शन से मिले आत्मविश्वास को एशियाई खेलों की कठिन चुनौती में बदलने में सफल रहे, तो टीम के पास इतिहास रचने का मौका होगा।
और शायद यही वजह है कि कुट्टप्पा ने अगली बड़ी जश्न की शाम को फिलहाल रोक रखा है। उनका लक्ष्य साफ है—पहले एशियाई खेलों में अपना सर्वश्रेष्ठ देना और उसके बाद भारत लौटकर जश्न मनाने का एक नहीं, बल्कि दोहरा कारण हासिल करना।
Richa Sharma